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पाकिस्तान को दगा देगी तकदीर या बदलेगा इतिहास

Posted On: 14 May, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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फिर एक बार पाकिस्तान की जनता ने लोकतंत्रिक सरकार का सपना सजाए नवाज शरीफ को सत्ता के करीब पहुंचा दिया है. हालांकि ये पहली बार नहीं है जब नवाज शरीफ के हाथों में देश की कमान दी जाने वाली है. लेकिन चिंतनीय तथ्य यह है कि क्या इस बार भी पाकिस्तान के आवाम के हाथ वही निराशा लगेगी जिसका साया उसे पाकिस्तान के निर्माण के समय से ही परेशान कर रहा है?




उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान की स्थापना के ही समय से पाकिस्तानी आवाम अन्य किसी भी देश यहां तक कि भारत की जनता से भी कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था में विश्वास रखती है. तभी तो हर बार आतंकवादी गुटों और चरमपंथी समुदायों द्वारा धमकियां मिलने के बाद तमाम डर और समस्याओं के बावजूद वह हर बार लोकतांत्रिक तरीके से सरकार चुनकर सत्ता में लाती है. जिस देश में सीधे और प्रत्यक्ष तौर पर आतंकवाद देश की जनता को प्रभावित करता है वहां हर बार लोकतंत्रिक सरकार को ही सत्ता सौंपना अपने आप में हैरान कर देने वाला विषय है. हालिया चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें कट्टरपंथी समर्थकों को जनता ने ना के बराबर वोट दिए और नवाज शरीफ, जिन्होंने आज की तारीख में पाकिस्तान की सबसे बड़ी जरूरत आर्थिक सुधार और विकास के साथ भारत के बेहतर संबंध को अपना चुनावी एजेंडा बनाया, को सत्ता सौंपने जा रही है.


लेकिन पाकिस्तान के अंदरूनी हालात बेहद जटिल हैं, वह इतने ज्यादा उलझे हुए हैं कि पहली नजर में उन्हें समझ पाना तक मुमकिन नहीं है और इसी नासमझी की वजह से हम पाकिस्तानी हुकूमत को तानाशाह और कट्टर करार देते हैं. जबकि सच यह है कि पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वहां उच्च वर्गीय सामंतवाद और अति महत्वाकांक्षा से ग्रस्त लोग प्रभावी हैं जो हर बार जनता द्वारा चयनित सरकार को अपदस्थ कर लोकतांत्रिक देश के सपने को तोड़ देते हैं.


भले ही पाकिस्तान में सरकार चुनी जाती हो लेकिन सच यह है कि वह सरकार स्वयं एक रबर का खिलौना होती है जिसे अपनी अंगुलियों पर नचाने वाली है वहां की सेना, जो खुद कट्टरपंथ की विचारधारा से प्रेरित और उसी प्रकार के लोगों द्वारा पोषित है. इसका सबसे बड़ा उदाहरण है लाहौर समझौता, जिसके जरिए पाकिस्तान और भारत के संबंध सुधारने की कवायद तेज की गई, के तुरंत बाद हुआ कारगिल युद्ध जिसकी खबर तक तात्कालिक पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को नहीं थी. इसी युद्ध के दौरान सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान की कमान संभालकर नवाज शरीफ को फांसी देने का आदेश दे दिया. यह पहला ऐसा मामला नहीं था. इससे पहले पाकिस्तान के नौंवे प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को भी सेना द्वारा फांसी के फंदे पर लटकाया जा चुका था. नवाज शरीफ सौभाग्यशाली थे कि उनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया लेकिन शुरू से लेकर अंत तक सेना की कार्यप्रणाली ही प्रभावी रही.


उल्लेखनीय है कि पाकिस्तानी जांच एजेंसी आईएसआई सेना के नियंत्रण में हैं और सेना चरमपंथियों के साथ काम कर ज्यादा संतुष्टि महसूस करती है जिसकी वजह से पाकिस्तान की राजनैतिक और सामाजिक व्यवस्था चरमराई रहती है.


पाकिस्तानी जनता की एक और सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह चुनी हुई सरकार को सत्ता में ले तो आती है लेकिन उसे बचाने का प्रयास नहीं करती. अर्थात अगर सेना सरकार को अपदस्थ कर खुद सिंहासन पर स्थापित हो जाती है तो जनता की ओर से इसके विरोध में कोई भी आवाज नहीं उठती.


वैसे इस बार कुछ बदलाव भी देखने को मिल सकता है क्योंकि नवाज शरीफ के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के संकेत आने के साथ ही सेना के खेमे में हलचलें तेज होने लगी हैं. परवेज मुशर्रफ के राष्ट्रपति पद पर रहते हुए कई सेना अधिकारियों की पदोन्नति की गई थी लेकिन अब कहीं ऐसा न हो कि उन सभी सैन्य अधिकारियों पर भावी सरकार की गाज गिरे. नवाज शरीफ यह भी स्पष्ट कर चुके हैं कि इस बार ऐसी कोई गलती नहीं करेंगे जो उन्होंने पिछली बार की थी और जिसकी वजह से उन्हें अपना पद गंवाना पड़ा था.


बहुत हद तक यह उम्मीद की जा सकती है कि इस बार पाकिस्तान की तकदीर जो हमेशा उसे दगा दे जाती है, अपना रवैया बदल लेगी लेकिन वे सभी कारक जो पाकिस्तानी राजनैतिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता.




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