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कैसे एक समझौते ने छीन ली शास्त्री की जिंदगी

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lal bahadur shastriवर्ष 1966, यह साल भारत के इतिहास और उसके पड़ोसी मुल्क की चालाकी को बहुत ही बखूबी बयां करता है. यह वो वर्ष है जब एक ओर भारत अपनी आन बान शान के लिए दुनिया भर में पहचान बनाने लगा था और वहीं यह वर्ष कुछ अहितकारी लोगों की हरकतों का पर्याय भी बना.


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देश की सुरक्षा, अखंडता और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी मुल्क के साथ मधुर संबंध कायम करने के उद्देश्य से भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधि भी सोवियत रूस के प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित ताशकंद सम्मेलन में शामिल हुए. इस सम्मेलन के दौरान तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) और पाकिस्तान सेना के तत्कालीन जनरल अयूब खान (Ayub Khan)के बीच एक समझौता हुआ, जिसे ताशकंद समझौते (Tashkent Agreement) के रूप में जाना जाता है. इस समझौते के अंतर्गत भारत और पाकिस्तान ने कुछ बातों पर सहमति रखी जिनमें निम्नलिखित बिंदु प्रमुख हैं:


कमरे के लिए एक पंखा नहीं खरीद सके नेहरू


1. भारत और पाकिस्तान दोनों ही शक्ति का प्रयोग नहीं करेंगे और अपने-अपने झगड़ों को शांतिपूर्ण तरीके से उन्हें सुलझाएंगे.

2. दोनों पड़ोसी देश वर्ष 1966 की 25 फरवरी तक अपनी-अपनी सेनाएं सीमा से हटा लेंगे.

3. भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी संबंध होंगे, वह किसी भी रूप में एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे.

4. भारत और पाकिस्तान से आए शरणार्थियों और अवैध तरीके से प्रवास पर विमर्श जारी रखा जाए. संघर्षों और विभाजन के दौरान एक-दूसरे की संपत्ति को लौटाने पर विचार करेंगे.



इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद ऐसा हुआ जिसकी आशंका शायद किसी को भी नहीं थी. देश को किसानों और सेना के जवानों की सच्ची ताकत और उनके महत्व से परिचित करवाने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री जिन्होंने पाकिस्तानी जनरल अयूब खान के साथ ताशकंद के समझौते पर हस्ताक्षर किया था, किसे पता था कि वही समझौता देश के इस चिराग को बुझा देगा. ताशकंद यात्रा के दौरान लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हो गई लेकिन उनकी मृत्यु का क्या कारण रहा यह किसी को भी समझ नहीं आया.



वर्ष 1955 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था, देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री(Lal Bahadur Shastri) की समझदारी और सूझबूझ की ही वजह से भारत लगभग जीत चुका था और भारतीय सेना पूरे जोश के साथ लाहौर तक पहुंच चुकी थी. लेकिन कुछ सियासी ताकतों के नापाक मंसूबों ने पूरी तस्वीर पलटकर रख दी और इस बीच ताशकंद का वो समझौता आया जिसने भारत के विरोध में काम किया.


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भारत चाहता था कि जो टुकड़ा खोया है उसे वापस भारत का हिस्सा बना लिया जाए लेकिन ताशकंद समझौता इसके विपरीत था. लाल बहादुर शास्त्री खुद यह चाहते थे कि देश के दोनों हिस्से एक हो जाएं. लाहौर के हवाई अड्डे पर भारत की सेना पहुंचने वाली थी कि तभी अमेरिका, जिसने भारत से ज्यादा पाकिस्तान का साथ निभाया है, ने युद्ध रोकने का निर्देश दे दिया. अमेरिका का कहना था कि युद्ध थोड़े दिनों के टाल दिया जाए ताकि लाहौर में जो अमेरिकी नागरिक रह रहे हैं वह कुशलतापूर्वक वहां से निकल जाएं. रूस और अमेरिका ने युद्धविराम के लिए रूस के ताशकंद में एक समझौता बुला लिया. ताशकंद (Tashkent Agreement)जाना लाल बहादुर शास्त्री(Lal Bahadur Shastri) को बहुत भारी पड़ा और वहां से उनका पार्थिव शरीर ही वापस आया.



लाल बहादुर शास्त्री(Lal Bahadur Shastri) का शरीर जब वापस भारत आया तो उनके बेटे का कहना था कि उनकी छाती, पीठ और पेट पर नीले निशान थे, जिन्हें देखकर साफ लग रहा था कि उन्हें जहर दिया गया है. जबकि ताशकंद में हुए उनके पोस्टपार्टम में मौत का कारण स्पष्ट ना कर, सीधे नैचुरल डेथ करार दे दिया गया था.



ऐसा भी कहा जाता है कि लाल बहादुर शास्त्री (Lal Bahadur Shastri) इस समझौते के लिए ताशकंद जाना ही नहीं चाहते थे लेकिन कुछ अंदरूनी और बाहरी तत्वों की मिलीभगत ने देश का यह लाल उससे छीन लिया.



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