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बेनजीर को देखकर इन्दिरा की आंखें भर आती थीं

Posted On: 7 Jul, 2013 Others में

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शिमला समझौता कई मायने में भारत और पाकिस्तान के लिए महत्वपूर्ण है. वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान दोनों जेलों में कई युद्धबंदी मौजूद थे. उन्हें आजाद करवाना और भारत-पाक के रिश्तों को सुधारने की कवायद के तहत वर्ष 1972 में शिमला समझौता हुआ था. यह समझौता कई मायनों में महत्वपूर्ण था. एक तो पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी और पाकिस्तानी की भावी प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो पहली बार भारत की सरजमीं पर उतरी थीं. वहीं दूसरी ओर पहली बार भारत-पाकिस्तान के बीच साझी जरूरतों के तहत समझौता होने वाला था.



शिमला समझौते के दौरान पाकिस्तानी हुकूमत की कुछ ऐसी बातें भी सामने आईं जो बहुत से लोगों को थोड़ी अटपटी प्रतीत हो सकती हैं लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि पाकिस्तानी खेमे में एक कथन बहुत प्रचलित था ‘लड़का हुआ है’. आप सोच रहे होंगे कि इसका क्या अर्थ है? उल्लेखनीय है कि जब भी दो देशों के बीच समझौते को मंजूरी मिलती है तो पाकिस्तानी खेमे द्वारा इस सफलता का जश्न ‘लड़का हुआ है लड़का’ कहकर मनाया जाता है और अगर किसी वजह से समझौता रद्द हो जाता है तो इस पर लड़की पैदा हुई है, कहकर दुख मनाया जाता है.


हर हसीना को देखकर उसका दिल मचल उठता था


2 जुलाई, 1972 रात करीब 12 बज के 40 मिनट हुए थे. 19 साल की बेनजीर अपने कमरे में सोई हुई थीं कि अचानक उन्हें नीचे से शोर सुनाई देने लगा. वह पहले माले पर स्थित अपने कमरे में थीं और शोर सुनकर भागकर नीचे आईं. नीचे उन्हें पत्रकारों, कैमरामैनों और दोनों देशों के प्रतिनिधियों का हुजूम दिख रहा था. उन्हें ‘लड़का हुआ है लड़का’ जैसी आवाजें सुनाई दे रही थीं, लेकिन जब तक वह अपने पिता के पास पहुंच पातीं तब तक दोनों देशों द्वारा शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए जा चुके थे.


ऐसी मस्जिद जहां समलैंगिक भी प्रवेश कर सकें !!


उस समझौते के दौरान इन्दिरा को भी खूब अपने पिता और स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की याद सताती थी. जब-जब वह युवा बेनजीर को अपने पिता से हठ करते हुए और उनके पिता को उनके साथ दुलार करते हुए देखतीं तो उन्हें अपनी युवावस्था के याद आती थी. वह उन दोनों के संबंध में अपना बचपन और पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ अपने संबंध की यादें खोजने लगती थीं और ऐसा करते हुए वह कई बार बेहद भावुक भी हो जाती थीं.


गोरिल्ला लड़ाई में माहिर रहे हैं नेल्सन मंडेला

क्यों बेनज़ीर का मुस्कुराना मंजूर नहीं था



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