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क्या होगा अगर ग्रीस की तरह भारत में पैसे देना बंद कर दे बैंकों के एटीएम?

Posted On: 23 Jul, 2015 Others में

Mukesh Kumar

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आज हमारी स्थिति वैसी नहीं है जैसी ग्रीस में लोगों की हो चुकी है. फिर भी, कल्पना कीजिये की किसी दिन आपको पैसों की जरूरत हो. एटीएम मशीनों से कुछ दिनों से बहुत कम पैसा निकल रहा हो. आप पैसे निकालने के लिये पंक्ति में खड़े हों, पर मशीनों से पैसों की निकासी बंद हो गयी हो. फिर आप कल निकाल लेने के इरादे के साथ घर लौटें. लेकिन तभी प्रधानमंत्री रेडियो पर अपने मन की बात में यह बता रहे हों कि बैंकों में पैसे न होने के कारण एटीएम मशीनों से कुछ दिनों के लिये कोई निकासी नहीं की जा सकेगी! इस स्थिति की कल्पना से ही जो भाव और सवाल आपके मन में उठे हैं वो महज शंका नहीं है. कुछ ऐसी ही स्थितियों का सामना ग्रीस में रहने वाले लोगों को करना पड़ा जब कर्ज में बुरे तरीक़े से फँसे होने के कारण वहाँ के बैंकों को बंद कर दिया गया. उससे पहले एटीएम मशीनों से एक दिन में केवल 60 यूरो निकालने की अनुमति दी गयी.



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क्यों आयी बैंकों को बंद करने की नौबत?

लंबे समय तक ग्रीस में शासन करने वाले नेताओं-मंत्रियों की गलत नीतियों की वजह से वर्ष 2014 तक गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रहे बच्चों की संख्या 40.5% हो गयी जो वर्ष 2008 में 23 % थी. मार्च 2015 में युवाओं की बेरोजगारी दर 49.7% तक पहुँच गयी. वर्ष 2011 से 2014 के बीच पेंशन की राशि का भुगतान 27% कम होने लगा. इसके अलावा यूरोपियन सेंट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से लिये गये ऋण की अदायगी के लिये बैंकों के पास अत्यंत सीमित जमा राशि होने के कारण ग्रीस में बैंकों को बंद करने की नौबत आयी.


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क्या भारत में आ सकती है ऐसी स्थिति?

भारत की स्थिति ग्रीस से भिन्न है. वर्ष 2014 में ग्रीस की आबादी 110 लाख थी. इसके अलावा वह यूरोपीय संघ का सदस्य रहा है. यूरोपीय संघ 28 देशों का समूह है जिसकी आधिकारिक मुद्रा यूरो है. आपसी समझौतों के जरिये ये देश एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. आपसी व्यापार, आर्थिक गतिविधियों और मौद्रिक समरूपता के लिये यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के लिये एक केंद्रीय बैंक की स्थापना की गयी है जो यूरोपियन सेंट्रल बैंक के नाम से जानी जाती है. इस बैंक का मुख्य काम सदस्य देशों के बीच कीमत मूल्य स्थायित्व और यूरो की क्रय शक्ति को बनाये रखना है. सदस्य देश होने के कारण ग्रीस यूरोपीय संघ के नियमों के दायरे में बँधा हुआ है.



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भारत की अपनी मुद्रा रूपया के नाम से जानी जाती है. इसकी क्रय शक्ति को बनाये रखने की जिम्मेदारी भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के पास है. इससे संबंधित कोई भी नये नियम बनाने के लिये भारतीय सरकार और केंद्रीय बैंक स्वतंत्र है. हालांकि, ये नियम कई बार अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की नीतियों से प्रभावित होते रहते हैं. फिलहाल तो नहीं, लेकिन जैसे-जैसे आयात और बाह्य ऋण बढ़ता जायेगा और उसके मुकाबले निर्यात और ऋणों की अदायगी घटते जायेगी वैसे-वैसे ग्रीस जैसी स्थिति की दिशा में हमारा देश बढ़ता जायेगा.


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क्या होंगे इसके परिणाम?

ग्रीस जैसी स्थिति आने से पहले भारत में भी युवा बेरोजगारों की संख्या अत्यधिक होगी. बाहरी ऋणों और ब्याज की आदायगी का बोझ बढ़ता जायेगा. बैंकों में जमा पैसा तेजी से निकाला जाने लगेगा. एटीएम मशीनों में पैसों की पूर्ति कम होगी जिसके कारण लोग सामान्य जरूरत के हिसाब से भी पैसों की निकासी नहीं कर पायेंगे. लोगों की क्रय शक्ति घटेगी. मुद्रास्फीति बढ़ेगी और इन सब कारणों से गरीबों-अमीरों के बीच की दूरी बढ़ेगी. भारतीयों को अपनी आर्थिक जरूरतों के लिये दूसरे देशों और अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक संस्थाओं की ओर देखना होगा.Next……


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