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घबराइए मत! रोज का आना जाना है इन स्कूली बच्चों का

Posted On: 26 Dec, 2015 social issues में

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चाँद पर जाने का सपना क्या इस धरा पर रहने वाले समस्त निवासियों का है? क्या चाँद पर जाने का सपना केवल लोगों को यथार्थ से दूर रखने की सुनियोजित साजिश है? अगर आपको ये प्रश्न कोरी बक़वास लग रही हो तो नीचे लिखी पंक्तियों को पढ़ना और समझना आपके लिये बहुत महत्तवपूर्ण हो जाता है.


तस्वीर:क्रिस्टॉफ औटो


उस वक्त जब पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को चाँद पर जाने का सब्जबाग दिखाया जा रहा है उस समय यह ख़बर आपको चौंका सकती है! पृथ्वी पर चाँद तक पहुँचने का ज्ञान देने वाले जिन स्कूलों तक बच्चों की पहुँच का मार्ग तस्वीर में दिख रहे मार्ग जैसा हो उसे देखकर यह तो समझा ही जा सकता है कि भविष्य में चाँद अब मनुष्यों की पहुँच से सचमुच दूर नहीं रह पायेगा! हौंसलों की कमी तो मनुष्य में विज्ञान ने रहने ही नहीं दी है!


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स्कूल जाते मास़ूम की ये डरावनी तस्वीर किसी तथाकथित अविकसित एशियाई देश की नहीं है. ये कोलम्बिया के रियो नीग्रो के गाँव की तस्वीर है. एक ऐसा गाँव जो घाटियों के समीप अवस्थित है. एक ऐसा गाँव जिसको बाहरी दुनिया से जुड़ने के लिये 1,300 फीट ऊपर 40 एमपीएच के इस्पात के तारों से होकर गुजरना पड़ता है.


तस्वीर: क्रिस्टॉफ औटो


नौ वर्षीय डेज़ी मोरा कपड़े की थैली में बैठे अपने भाई के साथ जंग लगी पुली के सहारे रोजाना अपने घर से स्कूल तक का सफर तय करती हैं. पाँच वर्ष का उसका भाई जामिद खुद इस रास्ते स्कूल नहीं जा सकता इसलिये उसे ज़ूट की थैली में रख डेज़ी अपने साथ स्कूल ले जाती है. राह में अपनी गति को नियंत्रित करने के लिये वह लकड़ी से बने साँचे का इस्तेमाल करती है.


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इस गाँव के लोग नज़दीकी शहर जाने के लिये स्वयं को इस्पात के तार में फँसा सरकते हुए अपनी यात्रा पूरी करते हैं. इस गाँव में 12 ऐसे इस्पात के तार हैं जो घाटी के दोनों सिरे के बीच की दूरी को पाटते हैं. यही उन ग्रामीणों को बाहरी दुनिया से भी जोड़ने का एकमात्र साधन है.


यह तस्वीर आम लोगों को चाँद पर पहुँचने का सपना दिखा चाँद-मंगल यात्रा पर ख़रबों रूपये ख़र्च कर देने वालों की नीयतों को झकझोरने वाली है. यह तस्वीर मानव-समुदाय का यथार्थ है जो उसके सामने केवल एक प्रश्न खड़ी कर रही है, ‘क्या हम सचमुच चाँद पर जाने लायक हो गये हैं?’Next….


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